शायद वो लड़का पैदल जाने वाला था

Written by my friend Sarabjeet. What brilliant writing. I have tried doing this as well, but met with suspicious stares. Maybe one day, our society will change.

आज बाजार से घर वापस आते वक़्त एक लड़का दिखा, पैरों से अपाहिज… वो बमुश्किल लाठी की मदद से धीरे – धीरे चल पा रहा था।
मैं बाइक पर था… एक नज़र पड़ी और मैं आगे निकल गया। फिर कुछ ख्याल आया, तो मैंने बाइक पलटा कर उससे पूछा की क्या कहीं छोड़ सकता हूँ ?
कुछ अचरच में पड़ने के बाद उसने कहा – आगे मंडी के पास तक। मैंने उसे बाइक पर बैठने को कहा और मेरे हाथ का सहारा लेकर वह पीछे बैठ पाया।

चूँकि मैं शहर में नया हूँ, मैंने उसे रास्ता बताने को कहा… और वो बताता गया… करीब 3-4 किलोमीटर आगे उसका घर आया, वह उतरा और हंसकर कहा- धन्यवाद भैया।

मैं वापस अपने घर की ओर लौटने लगा, और मन में कुछ अच्छा सा… कुछ बुरा सा…दोनों लगने लगा। अच्छा कम, बुरा ज़्यादा क्योंकि जो दुरी मुझे बाइक से लौटने में दूर लग रही थी, उसे शायद वो लड़का पैदल जाने वाला था, जाता ही होगा हमेशा।

इतनी मुश्किल में भी उसका वो मुस्कुराना.. उसकी नहीं अपनी असमर्थता पर दुःख हो रहा था मुझे शायद… इसकी आधी भी शिद्दत से हम अपनी समस्याओं को अपना सकें तो शायद कहीं ज़्यादा शांति पा जायें जीवन में।

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